Sunday, August 26, 2012

गुज़श्ता शब


 रौशनी की एक बंद कोठरी में,
  एक सुराख से,
  मुसलसल टपक रहा है अंधेरा,


   घुटनो तक भर गया है,
   अंधेरे का पानी...

   कल रात,
   एक तड़प के समंदर से,
   उबल-उबल कर दर्द,
   फलक़ की सम्त उठता रहा..



 कल रात से ये बादल,
 स्याह बारिश कर रहे है.... 

ghazal


अब उससे राबता भी नहीं,
 वो मेरा कोई था भी नहीं

तो उसका नाम खुश्बू है,पर
इस सम्त तो मेहका भी नहीं


 है वो बहोत ज़्यादा अच्छा,
 पर मैं इतना बुरा भी नहीं


 है उससे बिछड़्ने को हम अब
 इसके सिवा रस्ता भी नहीं


 तुफां के डर से उडना ही था,
 परिंदा शज़र का था भी नहीं


 बस इक ही बार तो पूछा था,
 लो अब मैं पूछता भी नहीं


वो कैसे मेरा होगा भला,
अब वो तो खुद अपना भी नहीं


sookha


ये मिट्टी कैसी उधड गयी हैं देखो तो,
तागे इसके उछल - उछल कर,
भाग गये सब,
तेज़ धूप मे झुलस के इसकी चमड़ी फट गयी हैं, 
एक लिजलिजा ज़ख़म,
झांकता रहता है, अंदर  से

सुना है,
एक चारागर है जो,
पानी का मरहम लगाता हैं,
अब्र की रुई से,
और पट्टी कर देता है... 

पिछले कुछ रोज़ से वो,
बग़ॅल वाले गांव मे जाकर बैठा है,
फ़सले लहरे मार रही है,
हरा समंदर लगता हैं वो गांव , परबत से देखो तो..

मैं अपनी आंखें खेतो में रखकर आ जाता हूं घर,
आस का मोतियाबिंद लग गया है उनको,
इंतज़ार झरता रहता है और,
तडप की उलटी सांसे चलती रहती है....

जुलाई भी बीत गया पर,
सूखा सूखा है मेरे गांव का आंगन...

Nazmowala