Sunday, August 26, 2012

ghazal


अब उससे राबता भी नहीं,
 वो मेरा कोई था भी नहीं

तो उसका नाम खुश्बू है,पर
इस सम्त तो मेहका भी नहीं


 है वो बहोत ज़्यादा अच्छा,
 पर मैं इतना बुरा भी नहीं


 है उससे बिछड़्ने को हम अब
 इसके सिवा रस्ता भी नहीं


 तुफां के डर से उडना ही था,
 परिंदा शज़र का था भी नहीं


 बस इक ही बार तो पूछा था,
 लो अब मैं पूछता भी नहीं


वो कैसे मेरा होगा भला,
अब वो तो खुद अपना भी नहीं


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