Sunday, August 26, 2012

sookha


ये मिट्टी कैसी उधड गयी हैं देखो तो,
तागे इसके उछल - उछल कर,
भाग गये सब,
तेज़ धूप मे झुलस के इसकी चमड़ी फट गयी हैं, 
एक लिजलिजा ज़ख़म,
झांकता रहता है, अंदर  से

सुना है,
एक चारागर है जो,
पानी का मरहम लगाता हैं,
अब्र की रुई से,
और पट्टी कर देता है... 

पिछले कुछ रोज़ से वो,
बग़ॅल वाले गांव मे जाकर बैठा है,
फ़सले लहरे मार रही है,
हरा समंदर लगता हैं वो गांव , परबत से देखो तो..

मैं अपनी आंखें खेतो में रखकर आ जाता हूं घर,
आस का मोतियाबिंद लग गया है उनको,
इंतज़ार झरता रहता है और,
तडप की उलटी सांसे चलती रहती है....

जुलाई भी बीत गया पर,
सूखा सूखा है मेरे गांव का आंगन...

Nazmowala

2 comments:

  1. भाई तेरे शब्दों में ये कैसा सुकून हैं .. .. जो बहार से गीली पट्टियों की तरह और भीतर से बुखार की तरह खौलते हैं
    _aharnishsagar

    ReplyDelete
  2. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete