रौशनी की एक बंद कोठरी में,
एक सुराख से,
मुसलसल टपक रहा है अंधेरा,
घुटनो तक भर गया है,
अंधेरे का पानी...
कल रात,
एक तड़प के समंदर से,
उबल-उबल कर दर्द,
फलक़ की सम्त उठता रहा..
कल रात से ये बादल,
स्याह बारिश कर रहे है....
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ReplyDelete:) pani aa raha hai..!
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