Sunday, August 26, 2012

गुज़श्ता शब


 रौशनी की एक बंद कोठरी में,
  एक सुराख से,
  मुसलसल टपक रहा है अंधेरा,


   घुटनो तक भर गया है,
   अंधेरे का पानी...

   कल रात,
   एक तड़प के समंदर से,
   उबल-उबल कर दर्द,
   फलक़ की सम्त उठता रहा..



 कल रात से ये बादल,
 स्याह बारिश कर रहे है.... 

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